Wednesday, April 29, 2015

चुपके चुपके रो लूंगा---

"तुमसे कुछ ना बोलूंगा
चुपके चुपके रो लूंगा
कोई शिकायत न करूँगा तुमसे
दर्द अकेले ही सब ढ़ो लूंगा
तुम चाहे जितना आजमाओं मुझे
छूट तुम्हें हम देते हैं
बिखरूं टूट के भी अब मैं तो 
उफ़ तक तुमसे ना बोलूंगा
चुपके चुपके रो लूंगा

तन्हा तन्हा रह लूंगा
खामोशियों से बातें कर लूंगा 
प्रिय!तुमसे न होऊंगा कभी
खुद से नाराज़ मैं हो लूंगा
चुपके चुपके रो लूंगा

ये चाहत नहीं है मेरी कि 
तुमको मुझसे कोई दुःख पहुंचे
आंसू तेरी आँखों के
मेरे नाम कभी बरसे
तुझको हँसता देखूं तो 
मैं भी तो जिन्दा हो लूंगा
तुमसे कुछ ना बोलूंगा 
प्रिय!चुपके चुपके रो लूंगा
चुपके चुपके रो लूंगा ……!!!"

-शशिष@11.06am

"एक छोटी सी गुजारिश ठुकरा गए हो
हमें फिर से अजनबी बना गए हो!
दिल को गुरूर था उनके अपनों में होने का
बड़ी बखूबी हमारी औकात दिखा गए वो!"

-शशिष@9.40am
"उनसे गुजारिश की थी हमने अपना समझकर
उन्होंने नकारा तो अजनबी होने का एहसास हुआ!'

-शशिष@9.33am 
"तू उदास रहे
तो मैं कैसे हंस लूं
जो तू भूखी रहे
तो मैं कैसे खा लूं
मैं कैसे चलूं
जब तू ही साथ ना दे
बता न प्रिय
मैं कैसे जीऊँ
जब तू ही सांस ना दे

कुछ भी कर
दे कोई सजा मुझको
पर नाराज़ ना हो तू मुझसे
कुछ भी कर
दे चाहे बद्दुआ मुझको
पर दूर ना हो तू मुझसे

इक तू ही तो है
जिसके सामने रोने से नहीं डरता हूँ मैं
इक तू ही तो है
कि जब तू पास हो
तो कुछ भी खोने से नहीं डरता हूँ मैं
मेरी उम्मीद ही मुझसे रूठ जाये
तो बता न कैसे उड़ लूं मैं
प्रिय जब तू ही उदास हो
तो बता न कैसे हंस लूं मैं

लौट आ कि बिन तेरे
कोई गुजारा नहीं है
यूँ तो तमाम दुनिया है मेरे साथ
पर तुझ जैसा कोई सहारा नहीं है
पर तुझ जैसा कोई सहारा नहीं है!!!"

-शशिष@11.14pm
"उनसे नाराज़ भी हों, तो हों कैसे
जिनसे सारी  खुशियाँ हैं!!!"

-शशिष@10.52pm
"ज़रा सा ग़म भी नहीं संभाल पाते हैं हम
क्या संभालेंगे हम तुमको!!!"

-शशिष@10.48pm
"कीजिये बात
या ना कीजिये
पर किसी को कभी
नज़रअंदाज़ ना कीजिये

वो लोग जो चाहते हैं आपको
वहीं खोजते हैं आपको हर पल हर घड़ी
जरुरी नहीं कि सारा वक्त दीजिये
पर किसी को कभी
नज़रअंदाज़ ना कीजिये

कोई नहीं जानता
कि कौन बना है किसके के लिए
कोई नहीं जानता
कि कौन रहेगा कितने पलों के लिए
दिल दीजिये
या ना दीजिये
पर किसी को कभी
नज़रअंदाज़ ना कीजिये!!!"

-शशिष@8.37pm

Tuesday, April 28, 2015

"कई रिश्तों को
अपनी मुठ्ठी में रक्खा है
इस नेटवर्क ने
जो एक पल को भी ये
छुट्टी पे जाता है
खामोशियाँ ऊपर से
और अंदर में बेचैनियां
पसर जाती हैं चारों तरफ!"

-शशिष@12.17pm


----पहचान लेंगे मुझको----

"यहाँ भी 
वहाँ भी 
आजकल जाता हूँ 
जहाँ भी 
बोलता हूँ जिस किसी से 
अपनी रूचि के बारे में 
सुनकर गौर से देखते हैं वो 
मेरी लम्बाई चौड़ाई को 
और नापते हैं 
मेरे दिमाग के क्षेत्रफल को 
फिर वो छोड़ते हैं 
एक छोटी सी हंसी 
मैं नहीं जानता 
मुझपर या मेरी रूचि पर 

पर वो नहीं जानते 
उनकी ये छोटी सी हंसी 
मेरे दिल पे 
बड़े घाव जैसी होती है 
कुछ डरा डरा सा उनके सामने होता हूँ उस वक्त 
रुक रुक के मुँह से निकलते हैं शब्द 
लगता है कुछ गलत बोले जा रहा हूँ 
तब कंपकपाती उँगलियों से 
खोलता हूँ अपनी पुरानी फ़ाइल 
और निकालता हूँ वो चंद पन्नें 
जिनपर 
मैंने अपने प्रयास को जन्म दिया था 

वो कुछ देर तक देखते हैं मेरे प्रयास को 
मैं उनके सामने बड़ी बेसब्री से खड़ा होता हूँ
कि कब वे कुछ बोले 
तभी कुछ देर में वो बोलते हैं मुझसे
"भाग जाओ भाग जाओ 
इससे पहले की वक्त की आंधी 
तुम्हें तुम्हारे प्रयासों तले दफ़न कर दे 
भाग जाओ भाग जाओ 

मेरा मन बेचैन हो जाता है 
पैर हाथ चिड़ियों के पंख की भांति फड़फड़ाने लगते हैं 
और मैं भागता हूँ 
तेजी से बहुत तेजी से 
पर अपने प्रयास से नहीं 
उनके पास से 
क्योंकि मैं जनता हूँ 
आँधियाँ बनी हुईं इमारतों को तो गिरा सकती हैं 
जलती दीप को तो बुझा सकती हैं 
पर मेरे सपनों को वो मकां 
जो अभी बना ही नहीं 
मेरे मन की वो ज्योति 
जो अभी जली ही नहीं 
उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती ये आँधियाँ 
उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती ये आँधियाँ 

मैं कुछ देर और ठहर सकता हूँ 
कुछ देर और यहाँ वहाँ भटक सकता हूँ 
क्योंकि मुझे पता है 
जब रुक जाएगी आँधी 
लोग निकलेंगे अपने घरों से 
और पहचान लेंगे मुझको 
और पहचान लेंगे मुझको!!!"

-शशिष

"गर ऐसा है
कि मैं हूँ
इसलिए तुम नहीं आते
तो आ जाओ ना
मैं परेशान नहीं करूँगा तुम्हें
नहीं पूछूंगा कोई सवाल
बस रहूँगा देखता तुमको
खामोश बेशब्द
और गर तुम ये भी नहीं चाहते
तो बोल दो एक बार
मैं खुद ही चला जाऊंगा
हमेशा के लिए
पर तुम आ जाओ
लौट आओ तुम!!!"

-शशिष@1.17am

"ढ़ेर सारी बातें 
करनी थी तुमसे
भागा भागा आया था
जल्दी से मैं
कई किस्से सुनाने थे
तुम्हें आज के
पर अफ़सोस
हर बार भाग के आने से
जरुरी तो नहीं
किसी का मिल जाना
जैसे कि आज
तुम भी नहीं मिले
पर कोई बात नहीं
तन्हाइयों को सुना देता हूँ
तुम्हारे बदले
मैं अपने तमाम किस्से
और ये सुनेंगी भी
मेरी हर फ़ालतू बातें
क्योंकि इन्हें
ये कहने नहीं आता
कि 'रात काफी हो गयी है
चलो फिर कल बात करते हैं'!!!"

-शशिष@11.43pm

Monday, April 27, 2015

"मैं नहीं चाहता
किसी को भी चाहना
उतनी शिद्दत से अब

किसी को भी
उस पागलपन से
मोहब्बत करना
जिसमें मैं भूल जाऊं सबकुछ
सिवाय एक उसके

बहुत मुश्किल होती है
तुम नहीं समझोगे
जब टूटता है प्यार
दिन मुश्किल होते हैं
रातें मुश्किल होती हैं
तुम नहीं समझोगे

बहुत मुश्किल हो जाता है
लबों पे एक छोटी सी भी
हंसी रखना
आँखों में बचा कर कोई भी
ख़ुशी रखना
और ऊपर से अपनों का ये प्रश्न
'क्या हुआ है उदास क्यों हो?'
जो थोड़ी बहुत जिंदगी
बची भी रहती है
सब मर जाती है एक झटके में

नहीं बिलकुल नहीं
नहीं करना मुझे अब मोहब्बत किसी से
बड़ी मुश्किल से लौटा हूँ मैं खुद में
अब फिर नहीं खोना है मुझे खुद को
ऐ खुदा कुछ देर
मुझे बस मुझमें रहने दे
करने दे मुझे मोहब्बत बस खुद से
पाने दे मुझे अपने आप को
करने दे बातें मुझे अपने आप से

बैठने दे अपने साथ मुझे
सुनने दे अपना ही दिल मुझे
बस कुछ देर के लिए
बचा मुझे
हो सके तो इस दुनिया से
दूर कहीं छुपा मुझे
जहाँ बस मैं रहूँ
और रहे मेरे साथ
बस परछाइयाँ मेरी

हां कुछ देर के लिए
मुझे तू भी नहीं चाहिए
क्योंकि तू भी बहुत तेज है
मैं जनता हूँ तेरी चालाकियां
जा मुझे खुद में रहने दे
हां कुछ देर के लिए !!!"

-शशिष@10.58am

"इश्क की राहों से गुजरना था हमें भी
जलते हुए घर में ठहरना था हमें भी

हमको कहां क़ुबूल थे सुकून भरे दिन
बेचैनियों के सागर में उतारना था हमें भी

कुछ भी नहीं था पर तुम्हें देखने के बाद
बदलना था हमें भी संवरना था हमें भी

हमको कहां मालूम था हम भी डूबेंगे
कि इश्क में टूट के बिखरना था हमें भी!!!"

-शशिष@8.00pm
"गीत मेरे अपने लबों पे तुम सजा के देखना
दर्द मेरे अपने दिलों में तुम बसा के देखना

तुम भी रोओगे जरूर, आंसू आ ही जाएंगे
मुझको दुनिया से  कभी, तुम हटा के देखना

खुश नहीं रह पाओगे जीत लो दुनिया भी तो
गर भरोसा न हो तो मुझको गवां के देखना

छोड़ दुनिया को तेरी बाहों में आऊंगा जरूर
याद मुझको कर कभी आंसू बहा के देखना

गर कभी ऐसा लगे कि तू नहीं दिल में मेरे
जा दिया कि छूट मुझको आजमा के देखना!"

-शशिष@7.37pm



"तुम हो और तुम हो भी नहीं
कुछ है और कुछ है भी नहीं
आसमा उदास होकर बैठा है
जमीं सूखी है और प्यास है भी नहीं!"

-शशिष@4.03pm
"हम नहीं रोकेंगे हवाओं को अब 
और शायद फिर मिले भी न हवाओं को हम!"

-शशिष 
"मैं किसी को याद करूँ
मैं भी किसी को याद आऊं
तो शायद अच्छा होता

कोई देखे सुबह से शाम तक रस्ता मेरा
मैं भी किसी के लिए रात भर जागूं
तो शायद अच्छा होता

मेरी तन्हाइयों में कोई गाये गीत
मैं भी गीत बन जाऊं किसी की तन्हाई का
तो शायद अच्छा होता

मेरी खामोशियों में कोई चुपके से सुनाये
कहानी कोई
किसी की खामोशियों का मैं भी कहानी बन पाऊं
तो शायद अच्छा होता \

कोई चुपके चुपके मुझसे मोहब्बत करे
मैं भी खत लिखूं किसी को प्रेम के
तो शायद अच्छा होता

मुझसे भी कोई ढ़ेर सारी बाते करे
मैं भी किसी की बातों में उलझ जाऊं
तो शायद अच्छा होता

कोई सबसे छुपा के लिखे अपनी डायरी में
दिल बना के नाम मेरा
किसी के दिल में मैं भी घर कर जाऊं
तो शायद अच्छा होता

किसी के लिए मैं भी सजाऊं अनगिनत सपने
कोई मेरे लिए भी मुमताज ए खास हो जाये
तो शायद अच्छा होता

किसी की साँसों से मेरा जीना तय हो
किसी की इक हंसी के लिए
मैं खुद को यूहीं फ़ना कर जाऊं
तो शायद अच्छा होता

मैं किसी को याद करूँ
मैं भी किसी को याद आऊं
तो शायद अच्छा होता!!!"

-शशिष@2.57pm


Sunday, April 26, 2015

"बहुत वक्त लगता है
दोस्ती को प्यार में बदलने में

पर कुछ पलों में ही
प्यार दोस्ती में बदल जाती है!"

-शशिष
"दीया बुझाया पर रात न हुई
कोशिश की पर रात न हुई

बहुत पुकारा नींद को हमने
पर मुकम्मल ये आवाज़ न हुई

रात पल पल कर के जाती रही
पर पूरी खुद से बात न हुई

वो यूँ तो मेरे पास ही था
फिर भी उससे मुलाकात न हुई

दीया बुझाया पर रात न हुई........!!!"

-शशिष@4.56am



"जिंदगी को कुछ रात तो
जागने दीजिये
केवल रौशनी काफी नहीं
जरुरी है शब का भी इल्म जीने के लिए!"

-शशिष@4.34am
"वो सारी रात जाग सकते हैं
पर तन्हाइयों के आँगन में
बातों के घर में उनको
शायद डर सा लगता है!!!"

-शशिष@4.28am
"दूर रह गर तेरे लिए दूरियां जरुरी हैं
हटा मुझे गर तेरे लिए मजबूरियां जरुरी हैं

आ जला डाले डायरी इश्क वाली हम
गर तेरे लिए लोगों की फब्तियां जरुरी हैं!"

-शशिष@4.21am




"तुम आ जाओ
तो साथ में खुशियों की चादर बनाएंगे

और फिर उसे हम
अपने हौसलों पर बिछायेंगे

फिर चैन से सोयेंगे हम
ख्वाबों की एक गहरी नींद

और असली चाँद को
बहला के फुसला के जमी पे लाएंगे

तुम आ जाओ
तो साथ में खुशियों की चादर बनाएंगे!"

-शशिष@3.36am


"तुम सुला के गए
पर मुझे नींद नहीं आई

मैं जागा रहा रात भर
न जाने क्यों चैन नहीं आई

बस तुम याद आते रहे
बार बार
बस तुम ही तुम दिखते रहे
आर पार
अंधेरों में न जाने क्यों
रौशनी बिखरी रही
और नींद में वो पुरानी वाली
बात भी नहीं आई

तुम सुला के गए
पर मुझे नींद नहीं आई!"

-शशिष@3.16am











"जब नींद ना हो
तो मुझे ना सुलाया करो

बैठो मेरे पास यहीं
मुझे छोड़ ना जाया करो!"

-शशिष@3.00am
"तुम्हें जाने की जल्दी रहती है
मुझे पास आने की जल्दी रहती है

तुम भागते रहते हो यहाँ वहाँ
मुझे ठहर जाने की जल्दी रहती है

तुम मन में लिए फिरते हो बात सभी
मुझे राजे दिल बताने की जल्दी रहती है

तुम चाहते हो वक़्त को लम्बा करना
मुझे लम्हों में सिमट जाने की जल्दी रहती है!"

-शशिष@2.55am.






"बिन बोले तेरा मुझको तन्हा तन्हा कर जाना
दुःख तो सच में देता है लम्हा लम्हा मर जाना!"

-शशिष 
"लुका छिपी का ये खेल
जो तुम मुझसे खेलते हो

अब तुम्हें कैसे बताऊँ मैं
तुम क्या क्या इसमें मुझसे खेलते हो!"

-शशिष 

Saturday, April 25, 2015

"जितनी मिली है जिंदगी 
ठीक से तू जीना सीख 
लबों पे तबस्सुम ला 
आसुंओं को पीना सीख 

गुजरे कल का रोना छोड़ 
वो तेरे हाथ के बाहर है 
आज अभी से दर्द सभी 
खुशियों से तू सीना सीख 

बेकार के कसमें वादों से 
खुद को बाहर लाके देख 
आनेवाले कल को छोड़ 
आज अभी में जीना सीख!"

-शशिष 


"रात के अँधेरे भी रोशन लगते हैं
जब तुम पास होते हो

सुबह की रोशनी भी फींकी लगती है
जब तुम दूर होते हो!!!"

-शशिष 
"किसी ने इतनी बार कहा
सोने को मुझसे

कि नींद सो गयी मुझमें
और मैं जागा रहा नींद में!!!"

-शशिष 
"तुमको पाना सच में खुद को
पाने जैसा क्यों लगता है
तुमसे मिलना सच में खुद से
मिलने जैसा क्यों लगता है

बातें तेरी अपने दिल की
बातों जैसी क्यों लगती हैं
उम्मीदें तेरी दिल के मेरे
इरादों जैसी क्यों लगती हैं

कुछ तो तुझमें ऐसा है
कि मुझमें भी वो कुछ जैसा है
कुछ तो है तुझमें शायद
जो मेरे दिल के जैसा है

तुझमें खोना अपने अंदर
आने जैसा क्यों लगता है
तुमको पाना सच में खुद को
पाने जैसा क्यों लगता है

तेरी शोहबत में फूलों सा
खिलने जैसा क्यों लगता है
तुमसे मिलना सच में खुद से
मिलने जैसा क्यों लगता है!!!"

-शशिष




"मेरे चलते गर तुम्हें कुछ परेशानियां हुईं हैं
अच्छा है इश्क़ में कुछ तो निशानियाँ हुईं हैं!"

-शशिष 
"कितनी उम्मीद है दिल को तेरे लौट आने की
निगाहें एक पल को भी रस्ते से बेघर नहीं हुईं!"

-शशिष


"मुझे नींद लग जाती अगर
तुम सपनों में आने का वादा करते

मैं सो गया होता कब का
अगर तुम आके जगाने का वादा करते!"

-शशिष 
"जब तक तू आ ना जाए 
तेरा इंतज़ार करते रहेंगे 
तू नफरत कर तेरी मर्जी 
हम तो प्यार करते रहेंगे!"

-शशिष 
"तुम जब भी बोलते हो
कि सो जाओ रात काफी हो गयी है
मुझे ऐसा लगता है
कि हुई हो मेरी भोर अभी
रात तो सदियों से चल रही थी
अब तो जाके रौशनी हुई है!"

-शशिष 
एक प्रश्न---

"मैं दूरियों को गर
थोड़ा कम कर दूँ
तुम्हें 'आप' से गर
'तुम' कर दूँ
तो बोलो
ख़फ़ा तो नहीं हो जाओगे?"

-शशिष 
"चंद लम्हों में यहाँ जिंदगी मौत में बदल जाती है
जबकि ज़माने लग जाते हैं जिंदगी को जिंदगी बनने के लिए!"

-शशिष कुमार तिवारी 

Friday, April 24, 2015

बस दो पंक्तियाँ---

"है कोई और तेरे दिल में तो बता दे पहले
एक दिल में दो नाम अटते नहीं हैं ठीक से!"

-शशिष कुमार तिवारी 
"हर कोई यहाँ
प्यार के रस्ते से गुजरता है

ये बात अलग है
हर किसी को मंजिल नहीं मिलती!!!"

-शशिष कुमार तिवारी 
"वो कहाँ है
किधर है
पता तो नहीं

पर
आँखों में
इंतज़ार की रौशनी
अब भी बरकरार है

और दिल में
उम्मीद के दीये को
हमने बुझने नहीं दिया कभी!!!"

-शशिष कुमार तिवारी 
"अब मैं
नहीं देता दबाव
किसी को
कुछ भी करने के लिए!

क्योंकि मैं
चाहता हूँ
कि लोग खुद समझे
अपने हित और अहित को!

पर हां
मैं कल भी साथ था
और आज भी हूँ
और हमेशा रहूँगा तैयार
तुम्हारे साथ चलने के लिए!!!"

-शशिष कुमार तिवारी 

Thursday, April 23, 2015

"हमने नफरत के बदले प्यार बांटने की जो कोशिश की है
शायद इसीलिए दुनिया ने हमें मारने की साजिश की है!!!"

-शशिष कुमार तिवारी 
"तुझे जितनी दूर जाना है जा मुझसे
गर बुला न लूं वापस तुम्हें तो फिर कहना!"

-शशिष कुमार तिवारी 
"मुश्किलों को हो मन जितना आजमाने दीजिये 
हम भी जिंदगी के तपाये हुए हैं चमकना नहीं छोड़ेंगे!!!"

-शशिष कुमार तिवारी 
"तुमसे जितना हो पाया तुमने उतना कर डाला
मेरी यादों को तुमने दिल से बेघर कर डाला

खूब जलाये तुमने सारे मेरे खत हँसते हँसते
और अपने वादों का तुमने निर्मम वध भी कर डाला 

फिर भी आंसू तेरी आँखों में बोल भला अब कैसे हैं
तुमने तो जितना चाहा मन मर्जी का कर डाला

मुझपर आखिर क्या गुजरेगी सोचा न समझा तुमने
पलक झपकते तुमने मुझको जख्मों का सागर कर डाला

मेरी यादों को तुमने दिल से बेघर कर डाला......

गए सीखा के तुम मुझको कसमें वादों की रीत सभी
यही हुआ अच्छा कि तुमने मुझको भी शायर कर डाला

तुमसे जितना हो पाया तुमने उतना कर डाला....!!!"

-शशिष कुमार तिवारी
(23rd April 2015, 3.00pm, New Delhi)



"हमको बस इतनी सी दे सादगी मौला
हम गुजरे जहां से कर दें रौशनी मौला!!!"

-शशिष कुमार तिवारी 
"अँधेरी रातों में मेरी रौशनी बनकर
तुम रहो मेरी सांसों में जिंदगी बनकर

मैं तुमपे सबकुछ लूटा दूंगा अपना
तुम आओ तो खुदा की बंदगी बनकर!"

-शशिष कुमार तिवारी
(23rd April 2015, 1.30am, New Delhi)
"अपनी यादों से तुम्हें भुला दूं अगर
बच क्या जायेगा जीने के लिए

गर तुम ही न रहो मेरे शब्दों में तो
बच क्या जायेगा लिखने के लिए!!!"

-शशिष कुमार तिवारी 
"खामोशियों को सुनना गर सबके बस में होता
तो आज प्यार इश्क और मोहब्बत सबके हक़ में होता!!!"

-शशिष कुमार तिवारी 
"आसमां भी कितना कम सा लगता है
जब प्यार कोई पागल सा उड़ता है

इतनी भी मोहब्बत की बात न कर
मुझे इन बातों से बहुत डर सा लगता है!!!"

-शशिष कुमार तिवारी 
"केवल ख़्वाब हैं उसके मेरी जिंदगी में
उसका कोई हकीकत नहीं मेरी जिंदगी में

मैं तो रोज तन्हाइयों में उससे मिलता हूँ
कोई महफ़िल नहीं उसकी मेरी जिंदगी में!"

-शशिष कुमार तिवारी
(23rd April 2015, 12.33pm, New Delhi)

Wednesday, April 22, 2015

"तुझको पाने की ये हसरत मेरी
खाक करती है मुझे ये उल्फत मेरी

कई बार दिल का घर जला के बैठा हूँ
फिर भी जिंदा रह जाती है मोहब्बत मेरी!!!"

-शशिष कुमार तिवारी  

Monday, April 20, 2015

"कभी सुनते थे
अपनी खामोशियों में भी
हम तुमको

पर अब तो
इतना शोर है अंदर में
कि कुछ सुनाई नहीं देता!!!"

-शशिष कुमार तिवारी 
"हमारे कितने 'आज' गुजर गए
पर एक उनका 'कल' नहीं आया!"

-शशिष कुमार तिवारी
(20th April 2015, 8.59pm, Delhi)
 सिर्फ तुमसे ही रहेगा-----

"तुम आये मेरी जिंदगी में
बिना पूछे
पर जाने के लिए भी
वही तरीका
सही नहीं था प्रिय

तुम्हें सोचना चाहिए था
बीज बोन से पहले
पहले ही डरना चाहिए था
और रखना चाहिए था
बीज को मिट्टी से दूर

पर तुमने तो ना केवल
मेरे दिल की मिट्टी में
बोए मोहब्बत के बीज
बल्कि कर डाली सिंचाई भी
और कितनी शिद्दत से की
तुमने देखभाल उसकी

कभी सूखने नहीं दिया
हरी पत्तियों को तुमने
डालते रहे रोज दर रोज
एहसासों का पानी जड़ में
और बिखेरते रहे
जलती धूप में भी
तुम भावनाओं की ठंढी हवा
अपने दुपट्टे से

क्या तुमने देखा नहीं गौर से प्रिय
क्या जाने से पहले
तुम्हें एक बार भी
ये विशाल हो चूका पेड़
दिखा नहीं

प्रिय क्या तुम्हें इसने रोका नहीं
बुलाया नहीं चिल्ला चिल्ला कर
या तुमने इसकी सुनी ही नहीं
दुनिया को सुनने की हड़बड़ी में

प्रिय जमाना कुछ भी कहे
पर मैं नहीं मान सकता
कि तुम्हारे कानों में
इसकी आवाज़ पहुंची ही नहीं
जिसने ताउम्र
तुम्हारे दिल के गुलज़ार में
अपने अस्तित्व को गाढ़ा हो
उसकी हल्की सी भी चींख
तुम्हारे दिल तक पहुंचने से
भला तुम भी कैसे रोक सकती हो
नहीं मैं नहीं मान सकता

प्रिय कहाँ हो तुम
देखो न ये पेड़
कितना उदास हो गया है
ये पत्तियां तो जैसे निर्जीव हुए जा रही हैं
हिल तक नहीं रहीं
प्रिय देखो न क्या हो गया है इसे
इसकी हालत तो देखो
ये पेड़ जो कल तक
तुम्हारे होने पर
गीत गया करता था
झूमता था नृत्य किया करता था
आज तुम्हारे न होने पर
कितना बेजान खड़ा है
मुझे डर है कि कहीं ये सुख न जाये
कहीं ये भूल न जाये अपने आप को
तुम्हारे वियोग में

प्रिय क्या तुम खुश होगे
इसके सुख जाने पर
जिसे तुमने अपने लहू से सींचा हो
जिसपर किया हो कुर्बान तुमने
अपनी सारी मोहब्बत
और वो
जिसने तुम्हारे सिवा
किसी का सपना नहीं देखा
जो बड़ा हुआ है
तुम्हारी मोहब्बत की हथेलियों में
आज भी तुम्हारे बिना
उसका कोई जड़ नहीं प्रिय
तुम्हीं उसके जमीन थे
तुम्हीं उसका आसमान थे

प्रिय तुम बिन तो ये मर ही जायेगा
इससे पहले कि
एक एक कर के
इसकी सारी पत्तियां
इससे जुदा हो जाएं
और धीरे धीरे ये हो जाए
बिलकुल अकेला
तोड़ने लगे दम
तुम्हारा नाम ले ले कर
प्रिय लौट आओ
प्रिय लौट आओ बचा लो इसे
लौटा दो इसे इसकी जिंदगी
इसका वो खूबसूरत हरापन
जो बस तुमसे था
तुमसे है
और प्रिय अनंत काल तक
जो सिर्फ तुमसे ही रहेगा
सिर्फ तुमसे ही रहेगा!!!"

-शशिष कुमार तिवारी
(20th April 2015, 2.55pm, New Delhi)


Sunday, April 19, 2015

"दुनिया जलती है तो जलने दीजिये
मैं मुसाफिर हूँ मुझे तो चलने दीजिये

जिसे जो कहना है शौक से कहे
आईना एक है चेहरे बदलने दीजिये

उसको रोकने से भी कोई फायदा नहीं
खुशबू है तो हवाओं में मिलने दीजिये

औ' एक दिन सब पूछेंगे राजे ख़ुशी मुझसे
चलिए हटिये मुझे उनका नाम लिखने दीजिये

दुनिया जलती है तो जलने दीजिये....!!!"


-शशिष कुमार तिवारी
(20th April 2015, 1.59AM, Delhi)
"तुम सच में भूल गए हो
या बस
दिखावा है प्रिय

क्युकिँ सुना है कि
कल रात
तुम्हारी आँखों में
फिर
प्यार के बरसात आये थे!!!"

-शशिष कुमार तिवारी
(20th April 2015, 1.35am, Delhi)

Saturday, April 18, 2015

"कोई मुझसे पूछे तो
बताऊँ पता तुम्हारा

तुम्हें निकलने कहाँ दिया
सदियों से इस दिल से हमने!!!"

-शशिष कुमार तिवारी 

Tuesday, April 14, 2015

जिंदगी के पन्नों से----

"कुछ आदतें बदलनी हैं मुझे
कुछ आदतों ने बहुत रुलाया है हमें
कुछ रिश्तों को करना है फिर से परिभाषित
कुछ रिश्तों ने बहुत उलझाया है हमें!!!"

-शशिष कुमार तिवारी
(11.30am, 15th April 2015, New Delhi)

Monday, April 13, 2015


----डरना छोड़ो लड़ना सीखो-----

"तुम्हारा डर कभी तुम्हें
'तुम' नहीं रहने देता
बना देता है तुम्हें डरपोक
तुममें कोई दम नहीं रहने देता

बस सोच पाते हो तुम
पर कुछ कर नहीं पाते
सपनें बुन तो लेते हो तुम
पर पूरा कर नहीं पाते

एक कदम बढ़ने में भी
कितना डरते हो तुम
बेवजह डर के मारे
कितने बहाने करते हो तुम

कभी पैसों का बहाना
कभी माँ बाप को बीच में खड़ा करते हो तुम
तो कभी पढ़ाई का बहाना
डर के मारे
अनगिनत बहानों का घर लगते हो तुम

चार लोगों की सुनते हो बात
और अपने दिल की कभी नहीं करते हो तुम
जब कह देते हैं चार लोग
कि तुम नहीं कर सकते
खुद पर शक कर पीछे हटते हो तुम

सबकुछ जानते हो
पर खुद को ही नहीं पहचानते हो तुम
हाय कितना डरते हो तुम
हाय कितना डरते हो तुम

यूँ डर डर के जीना
क्या तुम्हें अच्छा लगता है
वीर के हाथों में हीना
क्या तुम्हें अच्छा लगता है

क्या अच्छा लगता है तुम्हें
असफल लोगों से राय लेना
क्या अच्छा लगता है तुम्हें
जिंदगी से मुफ़्त की चाय लेना

क्या तुम नहीं चाहते
अपने सपनों को जीताना
क्या तुम नहीं चाहते
अपने माँ बाप को दुनिया दिखाना

अमीरी से तुम्हें इतना डर क्यों लगता है
गरीबी का तमगा तुम्हें अपना क्यों लगता है

तुम क्यों सोचते हो
कि तुम अमीर नहीं बन सकते
तुम क्यों मानते हो
कि तुम दुनिया मुट्ठी में नहीं कर सकते

तुम पा सकते हो
वो सब कुछ जो तुम सोचते हो
बस मेहनत से भागना छोड़ दो तुम
अच्छे लोगों से रिश्ता जोड़ लो तुम

खा लो कसम कि कुछ कर के गुजरना है
कीड़े मकौड़े की तरह तुम्हें नहीं मारना है

तुम्हें जीना है ऐसे
कि मौत को भी तुम्हारी जिंदगी पे नाज़ हो
और तुम जाओ जिस दिन यहाँ से
आँखों में आंसू लिए लोग हज़ार लाख हों

मार डालो उस डर को
जो तुम्हारे सपनों को मारता है
चुनौती दो उसे
जो तुम्हें कमजोर नपुंसक आंकता है

आगे बढ़ो तुममें शक्तियां आपार हैं
आसमा तुम्हारे क़दमों में झुकने को तैयार है

मेरी मानो तो
हर असंभव के संभव हो तुम
खुद को पहचान लो तो
अद्वितीय अद्भुत हो तुम
अद्वितीय अद्भुत हो तुम!!!"

-शशिष कुमार तिवारी
(14th April 2015, 1.00am, New Delhi)