Tuesday, April 10, 2012

ये सच है

(1.)

"मैंने देखा आज
हर रंग को
और चौक गया
सब रंग एक जैसे हैं...!!!
     
(2.)

मैंने सोचा था कि वो
कुछ और होंगे 
पर वो कुछ और ही निकले...!!! 

(3.)

सच को जानना तो ठीक है 
पर
देखना बड़ा बेतरतीब है...

निगाहें

"मुश्किलें तो मुश्किलें हैं ये कभी हटती नही
पर जो मुश्किलों से डर जाये उसकी कोई हस्ती नही
भविष्य के आकाश में जिन्हें भरने हैं अपने रंग
उनकी पलके झुकती तो हैं पर निगाहें मंजिल से कभी हटती नहीं"

हौसले

"माना कि हालात पल भर में बदलते नहीं
सपने पल भर में कभी सवरते नहीं
पर ये पूरा जहाँ उनकी क़दमों में होगा
गिर के भी जिनके हौसले कभी गिरते नहीं..."




Thursday, April 5, 2012

सितारें जमी पे हैं

सितारें जमी पे हैं
क्योकिं रास्ता आसमां का उन्हें पता नहीं

नदी नदी है तब तक ही
जब तक समंदर उसे कोई मिला नहीं

और वो कमल कीचड़ में हैं
क्योकिं महलों ने उसको सींचा नहीं

और है कीमती हीरा भी कोयला तब तक
जब तक जोहरी ने उसको देखा नहीं ...

Wednesday, April 4, 2012

कौन कहता है कि

कौन   कहता  है    कि   सपने   पुरे  नहीं   होते 
मोहब्बत  सपनों से   बेपनाह  कर  के  तो देखो 
और छुते हैं  आसमां को  जमी पे ही  रहने वाले 
अपने मुकद्दर से यारों एक  बार लड़ के तो देखो 

सच तो   ये  है   कि दुनिया   खुबसूरत बहुत है 
अपनी  नज़रों    में  मोहब्बत भर   के तो देखो 
और   खेलने का मजा  तो  बहुत  खूब  है यारों 
कभी  जीत और हार  से  ऊपर  बढ़ के तो देखो 

रुख  आँधियों का  मोड़ना भी  मुमकिन दिखेगा 
तुम फुर्सत  से कभी  खुद  के  अन्दर   तो देखो 
और    क्या   है    जो  तेरे   बस   में   नहीं   है 
एहसास   खुदा   का खुद  में कर   के तो   देखो 

कौन   कहता   है कि   सपने   पुरे    नहीं   होते 
मोहब्बत   सपनों   से   बेपनाह  कर के तो देखो 

Monday, April 2, 2012

मोहलत कहाँ है

फिर मुझे प्यार करने की मोहलत कहाँ है
तुझे याद करने की मोहलत कहाँ है
वो जमाना कुछ और था जो गुजर गया
पुराने पन्नों  को पढने की मोहलत कहाँ है

फिर मुझे प्यार करने की ...

इन छोटे से कंधो पे अब भार बहुत है
तेरे संग झूले झूलने की मोहलत कहाँ है  

सुबह से शाम तक वक़्त मुझे घुमाता है इस कदर
रात में संग छत पे टहलने की मोहलत कहाँ है

फिर मुझे प्यार करने की ...

इतनी भीड़ है की खुद को खोजना मुश्किल है
मीलों तक तेरा पीछा करने की मोहलत कहाँ है
यहाँ हर सांस में फायदे की बू आती है
तुझे जीने की सोचु फिर से मोहलत कहाँ है

फिर मुझे प्यार करने की ...

माँ की बूढी आँखों में सपने सूखते जा रहे हैं
तुझे ख्वाबों के महल बना के दू मोहलत कहाँ है
फिर मुझे प्यार करने की मोहलत कहाँ है
तुझे याद करने की मोहलत कहाँ है..."

----शशिष कुमार तिवारी

कुछ खोया खोया रहता हूँ

कुछ खोया खोया रहता हूँ
जब भी मैं तुमसे मिलता हूँ
नैनों में कुछ कुछ होता है
जब भी मैं तुझमे घुलता हूँ

रातों में तब मैं जगता हूँ
जब ख्वाबों में तुम आते हो
तुम हो न जाओ जुदा मुझसे
ये सोच के भी मैं डरता हूँ

कभी चलते चलते जब रुकता हूँ
तो पन्नों पे तुझको ही लिखता हूँ
जब अँधेरा सा दिल में छाता है
तब तुझको ही मैं पढता हूँ

बातों में जो न कह पाया मैं
ख़ामोशी में तो कहता हूँ
तू समझे या फिर न समझे
मैं दिल से तुझपे मरता हूँ

                         कुछ खोया खोया रहता हूँ ......   

A GAZAL

फिर मुझे प्यार करने की मोहलत कहाँ है
तुझे याद करने की मोहलत कहाँ है

वो जमाना कुछ और था जो गुजर गया
पुराने पन्नो को पढने की मोहलत कहाँ है
                  फिर मुझे प्यार करने की ...

इन छोटे से कंधो पे अब भार बहुत है
तेरे संग झूले झूलने की मोहलत कहाँ है

सुबह से शाम तक वक़्त मुझे घुमाता है इस कदर
रात में संग छत पे टहलने की मोहलत कहाँ है
                  फिर मुझे प्यार करने की ...

इतनी भीड़ है की खुद को खोजना मुश्किल है
मीलों तक तेरा पीछा करने की मोहलत कहाँ है

यहाँ हर सांस में फायदे की बू आती है
तुझे जीने की सोचु फिर से मोहलत कहाँ है
                 फिर मुझे प्यार करने की ...

माँ की बूढी आँखों में सपने सूखते जा रहे हैं
तुझे ख्वाबों के महल बना के दू मोहलत कहाँ है

फिर मुझे प्यार करने की मोहलत कहाँ है
तुझे याद करने की मोहलत कहाँ है..."   
----शशिष कुमार तिवारी 

 

A Poem dedicated to Gulshan Jagga Sir

तुमसे जो रिश्ता जोड़ा है
खुद को तब से कुछ समझा है
थोडा थोडा तो जागा हूँ
 दिल जबसे तुम में उलझा है 

बदला बदला सा मंजर है
आँखों में एक समंदर है
छुआ जब से तेरे शब्दों ने
इक आग लगी मेरे अन्दर है 

कुछ करने की चाहत है अब
नील गगन में मुझको उड़ना है
जब आशीष है तेरा मुझपे अब
ख्वाबो को सच में भूनना है
तुमसे जो रिश्ता जोड़ा है ....
----द्वारा शशिष कुमार तिवारी

Sunday, April 1, 2012

A Motivational Poem

कि इस कदर पागलपन हो
अपने काम के लिए
हर वक्त तैयार रह
तू नए इन्ताहन के लिए

हँसने दे उन्हें
जो आज तुझपे हँसते हैं
कल आयेंगे वो तेरे पास कुछ दान या ज्ञान के लिए
कि इस कदर पागलपन हो
अपने काम के लिए

खुद ही पे रख विश्वास इतना
कि खुदा खुद मजबूर हो जाये
तुझपे एहसान के लिए
लगा ले आग खुद में इस कदर
कि जर्रा जर्रा तुझ से मिले
अपनी पहचान के लिए
कि इस कदर पागलपन हो
अपने काम के लिए

रख तू पैर अपने जमी पे
मुठ्ठियों में आसमान के लिए
जरा सा जी ले आज इस दर्द को
जिन्दगी भर के मुस्कान के लिए
कि इस कदर पागलपन हो
अपने काम के लिए.....
---- by Shashish Kumar Tiwari