Tuesday, April 29, 2008

(C/O- पैसा )

तुम खरीदोगे रिश्ता ?
मैं बताऊंगा कहाँ बिकते हैं
मुझे मालूम है पता
अच्छा! आज नहीं
तो कोई बात नहीं
कभी तो जरुरत पड़ेगी
लिखो पता -
"इंसानियत"
c/o- 'पैसा'
'दुनिया'।

परिस्थिति

"वो दोस्त थे मेरे
बड़ी घनिष्ट्था थी हमारे बीच
वो आज भी मेरे दोस्त हैं
बस ...अब हमारे बीच
सब कुछ खाली है।"

एहसास

"मैंने अपनों के सामने
झुकने में कोई बुराई नहीं समझी
मैंने कई बार अपनों से माफ़ी मांगी
जबकि मैं ग़लत नहीं था
लेकिन आज ऐसा लगता है मुझे
मैं बिल्कुल सही नहीं था।"

रिश्ते ख़ुद नहीं उलझते

रिश्तों के बनने का
कोई सूत्र नहीं
क्योंकि
ये ख़ुद अपने आप बनते हैं
लेकिन रिश्तों को सुलझाने का हल है
क्योंकि
रिश्ते ख़ुद नहीं उलझते
बल्कि उलझाये जाते हैं।

सकारात्मक सोच

तुम कहते हो
तुम्हें जिन्दगी से बिल्कुल प्यार नहीं
जबकि मैं कहना चाहूँगा
कि
मुझे मौत का कोई डर नहीं।

तू अपनी चाहत दे मुझे

बहुत दर्द है जिन्दगी में कुछ राहत दे मुझे
ऐ खुदा बस तू अपनी चाहत दे मुझे

जहाँ में हर तरफ फरेब के रंग हैं दिखते
ख़ुद के साथ चलने की इजाजत दे मुझे

अब तक हारता रहा हूँ एक जीत दे मुझे
बस याद रहे किसी की हार की न आहात दे मुझे।

ये इश्क है मोहब्बत है

तुझे भुलने की हर कोशिश नाकाम होती है
आज भी तुझसे शुरू मेरी सुबह , तुझपे खत्म मेरी शाम होती है


शायद तुम भूल गए उन कसमों को उन वादों को 
अरे मोहब्बत में जीने वालो की मौत तक इम्तहाँ होती है


पहले दिखती है नई दुनिया हर तरफ़ खुशियों से भरी
फ़िर बाद में मोहब्बत की बेरुखी जिन्दगी भर साथ होती है


मुझे इस बात का गम नहीं कि आज तुम मेरे नहीं
तुमने गलत समझा मुझे गम येही हर पल मेरे साथ होती है


मुझे पता है तुम भी भूला नहीं पाओगे मुझको कभी
ये इश्क है मोहब्बत है इतनी बेजाँ नहीं होती है।

Sunday, April 27, 2008

रिश्तें

उसने कहा मुझसे-
"तुने नए रिश्तों के लिए
पुराने रिश्तों को भुला दिया"
मैं खामोश रहा उसकी इस बात पर
ये सोचता हुआ कि क्या रिश्तें
कोई समान होते हैं ?

Friday, April 25, 2008

जनसंख्या वृद्धि

मैं जा रहा हूँ आज ही
कुछ थोड़ी सी जमीं खरीदने
अपने कब्र के लिए
कल न जाने जगह मिले न मिले।

नियत

मैं सच कह रहा हूँ
मैं तुम्हें हराना नहीं चाहता
मैं तो बस जीतना चाहता हूँ। 

पूरक

अगर तुम डरते हो
मौत से
तो फ़िर जिन्दगी से भी डरो
क्यूंकि
ये जिन्दगी ही
तुम्हें धकेलेगी
एक दिन मौत के मुंह में। 
 

सावधान

तुम्हें अच्छा लगता है
सुनना
तुम्हारी बड़ाई
मुझे भी लगता है
और शायद
अच्छा लगता होगा 
सबो को
क्यूंकि
कोई अकेला नहीं
बल्कि हम सब 
मिलकर ठगते हैं
अपने आप को। 

लेकिन ...

हाँ मैं मानता हूँ
तुम्हारी बात
कि आज पैसों से
सब कुछ ख़रीदा जा सकता है
लेकिन तुम भी सुन लो
आज भी ऐसा बहुत कुछ है
जिसे पैसों के लिए
कभी बेचा नहीं जा सकता।

नए जख्म

समय क्या भरेगा
अब हमारे घाव
उसे तो ख़ुद हर रोज
नए जख्म दिए जा रहे हैं।
 

क्यों

मैंने देखा
बड़े गौर से
अपनी परछाई को
एक ही दिन में
न जाने कितनी बार बदलता है
फ़िर मैं तो आदमी हूँ
जरा सा बदल ही गया
तो आख़िर इसमे आपत्ति क्यों ?

मज़बूरी

अपनी खातिर जीना
कभी चाहा न था
पर ...
कोई दूजा न मिला
तो हम क्या करे।

ज्ञान /भूत अमीरी का

मैं नहीं डरता
गरीबी से
क्यूंकि
मैंने देखा है
भूत अमीरी का। 

सच का अनुभव

मुझे न समझाओ
सुबह के होने का अर्थ
मैंने अपनी जिन्दगी बिताई है
रात के साथ। 
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मैं हर रात 
सपनो को ओढ़ के सोता हूँ 
और फिर जैसे ही सुबह होती है 
उन्हें सिमेट वही विस्तर पे छोड़ देता हूँ ! 

और मैं डरने लगा हूँ

कितनी मोहब्बत है तुमसे बता न सका
मैं आज भी दिल से तुम्हे भूला न सका


तेरी हर बात आज भी कैद है दिल में मेरे
इसी डर से किसी को अपना दिल दिखा न सका


न जाने क्या रही होगी मज़बूरी खुदा के साथ
वो मेरी मांगी एक चीज मुझे दिला न सका


वो सपने जो बिखर गए तेरे जाने के बाद
मैं आज तक उन्हें फ़िर से सजा न सका


और मैं डरने लगा हूँ मोहब्बत की आरजू से अब
पंख खुशियों के अब तक मुझमें कोई लगा न सका...

उलझन

मुझे पता नहीं चलता
मैं क्या करू
ख़ुद को जीऊ या जिन्दगी को ?
जब कभी मैंने जिन्दगी को जीया
ख़ुद को ख़ुद से दूर पाया
और जब कभी मैंने ख़ुद को जी कर देखा
मुझे जिन्दगी दूर नज़र आई।

मेरी मुस्कराहट

चिंता मत करो
मैं जल्द ही बंद कर दूंगा मुस्कुराना
मेरी मुस्कराहट क्षणिक है
क्यूंकि मुझे मुस्कुराने से अधिक
दूसरो की मुस्कराहट देखना पसंद है .

Thursday, April 24, 2008

खिड़की वाली सीट
(१)
बड़ी मुश्किल से मौका मिलता है
हाँ मगर जब कभी भी
होता हूँ ट्रेन की खिड़की वाली सीट पर
तो खिड़कियों से झाककर
मैं बातें करता हूँ खेतो से
खेतो में लगे सरसों के फूल से
और पूछता हूँ
कैसा था मेरा बचपन
तुम्हे तो याद होगा!
और वे अब जैसे ही बताने को होते हैं
मैं आगे बढ़ जाता हूँ
वे पीछे छूट जाते हैं साथ लिए मेरा बचपन ।

(२)
ट्रेन की खिड़की वाली सीट पे बैठे
जब कभी मैं देखता हूँ खाली मैदान
बिल्कुल समतल
मुझे दिखाई देने लगता है मेरा बचपन खेलते हुए
एक झुंड में
और याद आने लगता है मुझे
जीतने और हारने की स्तिथियों में अन्तर।


(3)
ट्रेन की खिड़की वाली सीट पर बैठे
जब कभी निगाहें पड़ती है
किसी कच्ची पतली
दो खेतो के बीच के सड़क पे
तो मुझे न जाने क्यों लगता है
वो पगडण्डी सीधे मेरे घर को जायेगी
और फ़िर उस पगडण्डी पर
जब दिखता है कोई लड़का मुझे
साईकिल चलाता हुआ
तो मुझे याद आता है
मेरा बचपन साईकिल पे
लड़खराता हुआ।

(४)
ट्रेन की खिड़की से
बाहर देखना
मेरे लिए जैसे
अपने बीते दिनों के अन्दर झांकना है।

(५)
जब कभी कही
बिना किसी स्टेशन, जंक्शन
के ही रुक जाती है ट्रेन
और सौभाग्य से
खिड़की के बाहर के नज़ारों में हो
कुछ फूस के मकान
फ़िर मकान के सामने सड़क पे
खेलते कुछ बच्चे
तो लगता है काश ये ट्रेन
येही रुकी रह जाती
पर ये काश
काश ही रह जाती है।

(६)
जब कभी मुझे दिखाई देते है
ट्रेन की खिड़की से बाहर
पानी पटाये जाते कुछ खेत
तो मेरी सारी प्यास मिट जाती है
और पट आते हैं मेरे आँख।

(७)
काश की
मेरे शहर के डेरे वाले मकान में भी
ट्रेन की खिड़की होती
तो मैं हमेशा पाता
अपने कल को अपने आज के साथ।

तात्पर्य

पैसों का होना
प्यार का होना नहीं
खुशी का होना है
लेकिन ...
खुशी का होना
प्यार के होने से कही कम है .

तालो की जरुरत नहीं

अब दरवाजों पे
तालो की जरुरत नहीं
इन्हें मत लगाओ
आजकल खतरों ने अपने
जगह बदल लिए है .

क्यों नहीं

जब तेरा होना
सब कुछ का होना है
तो
फिर सब कुछ का होना
तेरा होना "क्यों नहीं"?

तुम क्या जानोगे

दर्द अपना बना के पराया किये जाने का तुम क्या जानोगे
दर्द सब कुछ पाकर खो जाने का तुम क्या जानोगे


तुम क्यों रोओगे तुम्हे आंसुओं की जरुरत नहीं
दर्द सताए जाने का आखिर तुम क्या जानोगे


तुमने तो हर बात को हलके से लिया जिन्दगी भर
बोझ शब्दों का दिल पर आखिर तुम क्या जानोगे


तुम तो एक पेड़ हो तो पत्तों के अलग होने का तुम्हें क्या गम
पत्तों के बेघर हो जाने का दर्द आखिर तुम क्या जानोगे


तुम्हारे लिए किसी का दुःख - दर्द तुम्हारा नहीं है
प्रेम सबों को अपना समझने का आखिर तुम क्या जानोगे .

समय डर गया है

कौन कहता है
समय को रोका नहीं जा सकता
नहीं मोडा जा सकता इसका रुख
समय तो रुक चुका है
डर गया है
हमारे अंधे रफ़्तार से .

रिश्तें

तुम कहते हो
रिश्तें कांच जैसे होते हैं
टूटने पे चुभते हैं
हाँथो में संभाल के रखु
क्योकि टूटने में पल भर
और जुड़ने में वर्षों लेते हैं
लेकिन मुझे लगता है
रिश्तें बीज जैसे होते हैं जो
अगर एक बार दिल की जमीं पे
बो दिए जाए तो न जाने
कितने जनम एक विशाल पेड़ बनकर रहा करते हैं
आंधियां भी उन्हें जड़ से नहीं उखाड़ सकती
अधिक से अधिक दो चार डालियाँ और
पांच छे पत्ते टूटेंगे
जो की कुछ ही दिनों के अन्दर फिर से उग आयेंगे .

मैं डरता हूँ

आज भी जब कभी
खिड़की से झांकता हूँ मैं
नीचे गेट पर और अगर
खुला होता है गेट
तो मुझे लगता है जैसे
वो तुम्हे बुला रहा है अपनी बाहें फैलाये
उसे शायद अब तक याद है
तुम्हारा आना
लेकिन शायद वो नहीं जानता कि
तुम कब का भूल गए हो
उस तक पहुचने का रास्ता
सोचता हूँ मैं उसे बता दूँ पर
मैं डरता हूँ
किसी के उम्मीद के टूटने से .

हमने समझा जिसे अपना


हमने समझा जिसे अपना अपना कहा था
था वो बस एक सपना जिसे एक न एक दिन टूटना था

सजाएँ सपने अपनी आँखों में हमने जिसके लिए
हमारी आँखों में वो चेहरा चुभेगा ऐसा सोचा कहा था

कितने नादान थे हम बड़ी आसानी से फंसाये गए
हमने सोचा हमें घर मिला पर घर जैसा उसमे कुछ नहीं था

जिसके मुस्कुराहटों पे थी अडी मुस्कुराहटें हमारी
यूं मार डालेंगे वे मेरी ख़ुशी को सोचा भी हो पर माना नहीं था

जिन्हें हम मानते थे खुद के लिए ईश्वर से बड़ा
वो इतने छोटे निकलेंगे कभी सोचा कहा था

रिश्तें ...कहने के लिए पर हमने तो दिल से बनाये थे
लेकिन दिल कम्बक्त को भी टूटना लिखा था

हमें तो अब भी विश्वास नहीं जो कुछ हुआ
लेकिन जो होना था उसे रोकने वाला कहा कोई था .

ऊँचाई

हर ऊँचाई के बाद एक ऊँचाई है
जिन्दगी कहाँ कभी आसमान छू पाई है
वो जो समझता है खुद को बहुत ऊंचा
वास्तव में ऊंची तो केवल उसकी परछाई है
पर परछाइयां तो हमेशा दूसरो के प्रकाश से बन पाई हैं
अर्थात उनका हर एक आज उनके मार्ग में खोद रहा खाई है
जो ये नही मानते
कि हर ऊँचाई के बाद एक ऊँचाई है
वो लोग जो तुम्हारी करते बडाई हैं
उनकी बदाइयों में कहाँ सच्चाई है
हाँ हो भी सकता है वे मन से कहते हों
पर तुम तो जानते हो न
हर ऊँचाई के बाद एक ऊँचाई है
जिन्दगी कहाँ कभी आसमान छू पाई है
ये जिन्दगी हर पल अधूरी है
कहाँ किसी के सपनो की पूर्ति हो पाई है
खुद को ऊंचा समझ रुकना
यहाँ एक भूल होगी क्योंकि
यहाँ हर ऊँचाई के बाद एक ऊँचाई है
जिन्दगी कहाँ कभी आसमान छू पाई है।

स्वप्न

न जाने कौन बुनता है
आकर अँधेरी रातो में
मेरे अन्दर कुछ स्वप्न
जो मुझे डरा देते हैं
गहरी नींद से जगा देते हैं
और उठ के जैसे ही मैं बैठता हूँ
न जाने कहाँ गायब हो जाते हैं वे स्वप्न
छोड़ कर मेरे दिमाग में अपनी परछाई
जो मुझे रातों में दिखाई नहीं देती
फिर मैं सुबह के इंतजार में सो जाता हूँ
सुबह होती है मैं खोलता हूँ अपनी आँखें
और झाकता हूँ अपने दिमाग में
जहाँ पाता हूँ मैं कुछ नहीं
न स्वप्न न स्वप्न की परछाई
फिर मैं झाकता हूँ अपने दिल में
पर स्वप्न वहाँ भी नहीं
हाँ लेकिन यहाँ मैं पाता हूँ एक चाह
अपने खोये स्वप्न को खोजने की
जिस से मिलना बन जाता है मेरे लिए
एक नया स्वप्न
जिसे मैं बुनता हूँ .