"एक अजनबी सा प्रेम"
इतनी बेताबी क्यों है
तुझे पाने की
मुझे पता नहीं
इतनी बेचैनी क्यों है
तुझमें सामने की
मुझे पता नहीं
क्या है जो
मुझ से मुझी को दूर कर रहा है
वो कीमत क्या है खुद को फिर से पाने की
मुझे पता नहीं
एक खालीपन सा बंद है मेरे अन्दर
वो नुक्सा क्या है
इस से आज़ादी पाने की
मुझे पता नहीं
पुरानी बातें... पुरानी यादें
और वो पुराने दिन
लौटेंगे कभी ये पता नहीं
लेकिन मेरी ये जिद
उन्हें कविताओं में पाने की
मुझे पता नहीं
एक दरिया सा हर शाम गुजरता है
इन आँखों से
इक आंधी दिल में क्यों उठती है हर रात
मुझे पता नहीं
क्यों हर सुबह कोई और दिखता है
मुझे मेरे आईने में
क्यों ये अजनबी नशा टूटता नहीं मेरे जागने में
मुझे पता नहीं
क्यों हर पल हर क्षण
बढ़ते जा रही है ये तड़प
खुद को आजमाने की
क्यों अब दिल को परवाह न रही
इस ज़माने की
मुझे पता नहीं
शायद ये कोई अजनबी सा प्रेम है
जो पल रहा है वर्षों से
मेरे अन्दर
मेरी ख़ामोशी और तन्हाई में
शायद ये तुम हो वाकई तुम हो
जिसका अब तक मुझे कुछ पता नहीं....!!!