Monday, April 13, 2015


----डरना छोड़ो लड़ना सीखो-----

"तुम्हारा डर कभी तुम्हें
'तुम' नहीं रहने देता
बना देता है तुम्हें डरपोक
तुममें कोई दम नहीं रहने देता

बस सोच पाते हो तुम
पर कुछ कर नहीं पाते
सपनें बुन तो लेते हो तुम
पर पूरा कर नहीं पाते

एक कदम बढ़ने में भी
कितना डरते हो तुम
बेवजह डर के मारे
कितने बहाने करते हो तुम

कभी पैसों का बहाना
कभी माँ बाप को बीच में खड़ा करते हो तुम
तो कभी पढ़ाई का बहाना
डर के मारे
अनगिनत बहानों का घर लगते हो तुम

चार लोगों की सुनते हो बात
और अपने दिल की कभी नहीं करते हो तुम
जब कह देते हैं चार लोग
कि तुम नहीं कर सकते
खुद पर शक कर पीछे हटते हो तुम

सबकुछ जानते हो
पर खुद को ही नहीं पहचानते हो तुम
हाय कितना डरते हो तुम
हाय कितना डरते हो तुम

यूँ डर डर के जीना
क्या तुम्हें अच्छा लगता है
वीर के हाथों में हीना
क्या तुम्हें अच्छा लगता है

क्या अच्छा लगता है तुम्हें
असफल लोगों से राय लेना
क्या अच्छा लगता है तुम्हें
जिंदगी से मुफ़्त की चाय लेना

क्या तुम नहीं चाहते
अपने सपनों को जीताना
क्या तुम नहीं चाहते
अपने माँ बाप को दुनिया दिखाना

अमीरी से तुम्हें इतना डर क्यों लगता है
गरीबी का तमगा तुम्हें अपना क्यों लगता है

तुम क्यों सोचते हो
कि तुम अमीर नहीं बन सकते
तुम क्यों मानते हो
कि तुम दुनिया मुट्ठी में नहीं कर सकते

तुम पा सकते हो
वो सब कुछ जो तुम सोचते हो
बस मेहनत से भागना छोड़ दो तुम
अच्छे लोगों से रिश्ता जोड़ लो तुम

खा लो कसम कि कुछ कर के गुजरना है
कीड़े मकौड़े की तरह तुम्हें नहीं मारना है

तुम्हें जीना है ऐसे
कि मौत को भी तुम्हारी जिंदगी पे नाज़ हो
और तुम जाओ जिस दिन यहाँ से
आँखों में आंसू लिए लोग हज़ार लाख हों

मार डालो उस डर को
जो तुम्हारे सपनों को मारता है
चुनौती दो उसे
जो तुम्हें कमजोर नपुंसक आंकता है

आगे बढ़ो तुममें शक्तियां आपार हैं
आसमा तुम्हारे क़दमों में झुकने को तैयार है

मेरी मानो तो
हर असंभव के संभव हो तुम
खुद को पहचान लो तो
अद्वितीय अद्भुत हो तुम
अद्वितीय अद्भुत हो तुम!!!"

-शशिष कुमार तिवारी
(14th April 2015, 1.00am, New Delhi)



















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