Saturday, April 25, 2015

"तुमको पाना सच में खुद को
पाने जैसा क्यों लगता है
तुमसे मिलना सच में खुद से
मिलने जैसा क्यों लगता है

बातें तेरी अपने दिल की
बातों जैसी क्यों लगती हैं
उम्मीदें तेरी दिल के मेरे
इरादों जैसी क्यों लगती हैं

कुछ तो तुझमें ऐसा है
कि मुझमें भी वो कुछ जैसा है
कुछ तो है तुझमें शायद
जो मेरे दिल के जैसा है

तुझमें खोना अपने अंदर
आने जैसा क्यों लगता है
तुमको पाना सच में खुद को
पाने जैसा क्यों लगता है

तेरी शोहबत में फूलों सा
खिलने जैसा क्यों लगता है
तुमसे मिलना सच में खुद से
मिलने जैसा क्यों लगता है!!!"

-शशिष




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