Sunday, November 18, 2012

इश्क में तेरे
सब कुछ लुटा बैठे हैं
प्रिय !!!
हम अपना नाम तक भुला बैठे हैं

अपनों से पूछते हैं
अपने घर का पता
तेरी याद में हम
सबकी यादें गवां बैठे हैं

सफ़र कैसा भी हो
कोई फर्क नहीं पड़ता
जब हम होशोहवास में
अपनी मंजिल भुला बैठे हैं

उन्हें मालूम है सबकुछ
फिर भी वो मेरे नहीं
खुदा तेरे लोग
इश्क की कीमत लगा बैठे हैं!!!

---शाशिष कुमार तिवारी
   (15 नवम्बर 2012 पटना)

Saturday, November 17, 2012

बड़े अरमान हैं दिल में दिल भले ही छोटा है
मैं ऊपर से हँसता हूँ कोई मेरे अन्दर में रोता है

ये हर दिन की कशमकस उफ़! ये जिन्दगी
कहीं रात ही नहीं कोई दिन में भी सोता है

बड़ी कुर्सियों पे बैठे छोटे लोग हैं जहां
इंसानियत का क़त्ल वहा वादों से होता है

कुत्ते भी वफादार हैं इंसानों की बस्ती में
भ्रष्टाचार का आरोप हमेशा इंसानों पे होता है

एक लम्बी छिट्ठी से प्रेम मैसेज में बदल गई
माँ अब जींस में होती है बच्चा जमीं पे रोता है

खुदा नाम को तेरे अब सब बेचते हैं यहाँ
बड़ी मुश्किल से अब कोई तुझ जैसा होता है

                                                         -शशिष कुमार तिवारी
                                                        (16 नवम्बर 2012 पटना )