Wednesday, April 10, 2013

 "अंतिम खोज तक"

मैंने बार बार
प्रयास किये
कि पा सकू तुम्हें
खोजता रहा
तुम्हें
यहाँ वहाँ
दिन रात
रात दिन
और बस तुम्हें
खोजने की जिद
तुम्हें फिर से पाने की
एक नादान दीवानगी में
न जाने कब से
धीरे धीरे
मैं खोता गया
खुद को ही।

और आज जब तुम
मिल गए
तो प्रिय ! मुझे कोई ख़ुशी नहीं
बस पछतावा है
कि काश!
तुम्हें खोजने की जिद में
मैंने न खोया होता खुद को
तो आज
तुमसे वर्षोंपरांत मिलना
मुझे जैसे 'मोक्ष' दे देता
लेकिन जब मैं ही नहीं हूँ
तो ख़ुशी कैसी, मोक्ष कैसा?

अब तुम यहीं रुको
जब तक कि
मैं लौट न आऊँ
खुद को लेके
खुद के अन्दर
तुम यहीं रुको...
प्रिय ! मेरा इंतजार करना
मैं लौटूंगा जरुर
हां कुछ देर हो सकती है
क्योंकि
खुद को कभी खोजा नहीं
मैं तो तुम्हीं में उलझा रहा
ताउम्र
बस तुम्हारे पते तलाशता रहा
बिलकुल एक नौसिखुआ डाकिया बन के
ये कुछ नया सा है
इस बार तुम हो
मैं हूँ
और बाकि है
"मेरी खोज"
तुम रुके रहना प्रिय!
मेरी अंतिम खोज तक
रुके रहना...रुके रहना
प्रिय ! तुम रुके रहना...

-शशिष कुमार तिवारी
 

Thursday, April 4, 2013

"प्रिय! तुम कविता ही हो"

तुम्हें चाहा
भूल जाना
और
कोशिश भी की
और पता है?
तुम्हें भूल भी गया
वो बात अलग है
कि
अब भी मैं
लिखता जा रहा हूँ
तुम्हें ही
और तुम्हारे भूलने को ही
हर रोज
और
लोग क्या कहते हैं
तुम्हें पता है?
लोग कहते हैं
कि
मैं क्या खूब कवितायेँ लिखता हूँ
लेकिन
मैंने तो केवल तुम्हें लिखा है
पर शायद
लोग सही ही कहते हैं
तुम कविता ही तो हो
जिसे जितना समझा जाए
उतना ही
कुछ और समझ लेना
बाकि बाकि सा लगता है
मेरे प्रिय!
तुम कविता ही हो!!!

-शशिष कुमार तिवारी

Tuesday, April 2, 2013

तुम

तुम हो
तो तुम तक ही है
मेरा जीना
तुम तक ही है
साँसों की पहुँच
और 
तुम तक ही है
मेरा होना

पर  जब 

तुम न हो
तो फिर भी  है
सब कुछ
यहाँ तक की तुम भी 
बस मुझे छोड़ के ...

कभी मैं सोचूं
तो
हूँ बिलकुल बेवकूफ सा
लेकिन
ख़त्म नहीं कर सकता
ये अपनी बेवकूफी
क्योंकि
इसके होने में तुम हो

और
पता है ?
मैंने नहीं किया
ख़त्म खुद को भी
आज तक 
क्योंकि
मेरे होने में भी
तुम हो
और तुम ही रहोगे
सदियों तक ...!!!

-शशिष  कुमार तिवारी