"अंतिम खोज तक"
मैंने बार बार
प्रयास किये
कि पा सकू तुम्हें
खोजता रहा
तुम्हें
यहाँ वहाँ
दिन रात
रात दिन
और बस तुम्हें
खोजने की जिद
तुम्हें फिर से पाने की
एक नादान दीवानगी में
न जाने कब से
धीरे धीरे
मैं खोता गया
खुद को ही।
और आज जब तुम
मिल गए
तो प्रिय ! मुझे कोई ख़ुशी नहीं
बस पछतावा है
कि काश!
तुम्हें खोजने की जिद में
मैंने न खोया होता खुद को
तो आज
तुमसे वर्षोंपरांत मिलना
मुझे जैसे 'मोक्ष' दे देता
लेकिन जब मैं ही नहीं हूँ
तो ख़ुशी कैसी, मोक्ष कैसा?
अब तुम यहीं रुको
जब तक कि
मैं लौट न आऊँ
खुद को लेके
खुद के अन्दर
तुम यहीं रुको...
प्रिय ! मेरा इंतजार करना
मैं लौटूंगा जरुर
हां कुछ देर हो सकती है
क्योंकि
खुद को कभी खोजा नहीं
मैं तो तुम्हीं में उलझा रहा
ताउम्र
बस तुम्हारे पते तलाशता रहा
बिलकुल एक नौसिखुआ डाकिया बन के
ये कुछ नया सा है
इस बार तुम हो
मैं हूँ
और बाकि है
"मेरी खोज"
तुम रुके रहना प्रिय!
मेरी अंतिम खोज तक
रुके रहना...रुके रहना
प्रिय ! तुम रुके रहना...
-शशिष कुमार तिवारी
मैंने बार बार
प्रयास किये
कि पा सकू तुम्हें
खोजता रहा
तुम्हें
यहाँ वहाँ
दिन रात
रात दिन
और बस तुम्हें
खोजने की जिद
तुम्हें फिर से पाने की
एक नादान दीवानगी में
न जाने कब से
धीरे धीरे
मैं खोता गया
खुद को ही।
और आज जब तुम
मिल गए
तो प्रिय ! मुझे कोई ख़ुशी नहीं
बस पछतावा है
कि काश!
तुम्हें खोजने की जिद में
मैंने न खोया होता खुद को
तो आज
तुमसे वर्षोंपरांत मिलना
मुझे जैसे 'मोक्ष' दे देता
लेकिन जब मैं ही नहीं हूँ
तो ख़ुशी कैसी, मोक्ष कैसा?
अब तुम यहीं रुको
जब तक कि
मैं लौट न आऊँ
खुद को लेके
खुद के अन्दर
तुम यहीं रुको...
प्रिय ! मेरा इंतजार करना
मैं लौटूंगा जरुर
हां कुछ देर हो सकती है
क्योंकि
खुद को कभी खोजा नहीं
मैं तो तुम्हीं में उलझा रहा
ताउम्र
बस तुम्हारे पते तलाशता रहा
बिलकुल एक नौसिखुआ डाकिया बन के
ये कुछ नया सा है
इस बार तुम हो
मैं हूँ
और बाकि है
"मेरी खोज"
तुम रुके रहना प्रिय!
मेरी अंतिम खोज तक
रुके रहना...रुके रहना
प्रिय ! तुम रुके रहना...
-शशिष कुमार तिवारी