----पहचान लेंगे मुझको----
"यहाँ भी
वहाँ भी
आजकल जाता हूँ
जहाँ भी
बोलता हूँ जिस किसी से
अपनी रूचि के बारे में
सुनकर गौर से देखते हैं वो
मेरी लम्बाई चौड़ाई को
और नापते हैं
मेरे दिमाग के क्षेत्रफल को
फिर वो छोड़ते हैं
एक छोटी सी हंसी
मैं नहीं जानता
मुझपर या मेरी रूचि पर
पर वो नहीं जानते
उनकी ये छोटी सी हंसी
मेरे दिल पे
बड़े घाव जैसी होती है
कुछ डरा डरा सा उनके सामने होता हूँ उस वक्त
रुक रुक के मुँह से निकलते हैं शब्द
लगता है कुछ गलत बोले जा रहा हूँ
तब कंपकपाती उँगलियों से
खोलता हूँ अपनी पुरानी फ़ाइल
और निकालता हूँ वो चंद पन्नें
जिनपर
मैंने अपने प्रयास को जन्म दिया था
वो कुछ देर तक देखते हैं मेरे प्रयास को
मैं उनके सामने बड़ी बेसब्री से खड़ा होता हूँ
कि कब वे कुछ बोले
तभी कुछ देर में वो बोलते हैं मुझसे
"भाग जाओ भाग जाओ
इससे पहले की वक्त की आंधी
तुम्हें तुम्हारे प्रयासों तले दफ़न कर दे
भाग जाओ भाग जाओ
मेरा मन बेचैन हो जाता है
पैर हाथ चिड़ियों के पंख की भांति फड़फड़ाने लगते हैं
और मैं भागता हूँ
तेजी से बहुत तेजी से
पर अपने प्रयास से नहीं
उनके पास से
क्योंकि मैं जनता हूँ
आँधियाँ बनी हुईं इमारतों को तो गिरा सकती हैं
जलती दीप को तो बुझा सकती हैं
पर मेरे सपनों को वो मकां
जो अभी बना ही नहीं
मेरे मन की वो ज्योति
जो अभी जली ही नहीं
उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती ये आँधियाँ
उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती ये आँधियाँ
मैं कुछ देर और ठहर सकता हूँ
कुछ देर और यहाँ वहाँ भटक सकता हूँ
क्योंकि मुझे पता है
जब रुक जाएगी आँधी
लोग निकलेंगे अपने घरों से
और पहचान लेंगे मुझको
और पहचान लेंगे मुझको!!!"
-शशिष
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