Monday, April 27, 2015

"मैं किसी को याद करूँ
मैं भी किसी को याद आऊं
तो शायद अच्छा होता

कोई देखे सुबह से शाम तक रस्ता मेरा
मैं भी किसी के लिए रात भर जागूं
तो शायद अच्छा होता

मेरी तन्हाइयों में कोई गाये गीत
मैं भी गीत बन जाऊं किसी की तन्हाई का
तो शायद अच्छा होता

मेरी खामोशियों में कोई चुपके से सुनाये
कहानी कोई
किसी की खामोशियों का मैं भी कहानी बन पाऊं
तो शायद अच्छा होता \

कोई चुपके चुपके मुझसे मोहब्बत करे
मैं भी खत लिखूं किसी को प्रेम के
तो शायद अच्छा होता

मुझसे भी कोई ढ़ेर सारी बाते करे
मैं भी किसी की बातों में उलझ जाऊं
तो शायद अच्छा होता

कोई सबसे छुपा के लिखे अपनी डायरी में
दिल बना के नाम मेरा
किसी के दिल में मैं भी घर कर जाऊं
तो शायद अच्छा होता

किसी के लिए मैं भी सजाऊं अनगिनत सपने
कोई मेरे लिए भी मुमताज ए खास हो जाये
तो शायद अच्छा होता

किसी की साँसों से मेरा जीना तय हो
किसी की इक हंसी के लिए
मैं खुद को यूहीं फ़ना कर जाऊं
तो शायद अच्छा होता

मैं किसी को याद करूँ
मैं भी किसी को याद आऊं
तो शायद अच्छा होता!!!"

-शशिष@2.57pm


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