Wednesday, June 11, 2008

कैसे लिख लेता हूँ मैं

क्या बताऊ कैसे लिख लेता हूँ मैं
न जाने क्या है इस दिल की गहराई में
जिसे कह के भी न कह पाता हूँ मैं
सोचता हूँ हर घड़ी न जाने किसके बारे में
आख़िर कौन है बंद आँखों से जिसको देख लेता हूँ मैं
क्या बताऊ कैसे लिख लेता हूँ मैं
छोटी सी उम्मीद दिल मे छोटी सी आशा है
पांऊँ कैसे अपने सपनो को 
चलो तुम्ही से पूछ लेता हूँ मैं
न मत कहना खामोश न रहना
समझना जरा सा सहारे किसके जीता हूँ मैं
क्या बताऊ कैसे लिख लेता हूँ मैं
ये आदत मेरी हमसफ़र सी है
इसी में डूब हर पल जीता हूँ मैं
कौन है? जो समझे मेरी ख़ुशी यहाँ
ग़मों को चूम के ही मुस्कुरा लेता हूँ मैं
अब क्या बताऊ कैसे लिख लेता हूँ मैं ...

मत पूछ कितना इंतजार है

तेरे आने का मत पूछ कितना इंतजार है
तेरे दीदार को ये आँखे कब से बेकरार हैं 
तुझे भूल जाने का भी बता क्या फायदा
जब दर्द आज भी इस दिल मे बरक़रार है
तेरे आने का मत पूछ कितना इंतजार है

न रास्ते न मंजिल न कोई हमसफ़र है
बिन तेरे सच पूछ तो जीना ये जीना बेकार है
बदल गए वो वक्त , वो लम्हें , कहाँ वो प्यार है
सुन सके मेरे दिल की आवाज़ 
न जाने वो दिल कहा किस पार है
तेरे आने का मत पूछ कितना इंतज़ार है

मुझे पता है ये इंतज़ार कभी ख़त्म न होगी
फ़िर भी इस दिल में पलती उम्मीद हज़ार है
कैसे समझाऊ मैं तुम्हारी आंखो को
मेरी खामोशी ही मेरे दिल का इजहार है
तेरे आने का मत पूछ कितना इंतज़ार है ...