न जाने कौन बुनता है
आकर अँधेरी रातो में
मेरे अन्दर कुछ स्वप्न
जो मुझे डरा देते हैं
गहरी नींद से जगा देते हैं
और उठ के जैसे ही मैं बैठता हूँ
न जाने कहाँ गायब हो जाते हैं वे स्वप्न
छोड़ कर मेरे दिमाग में अपनी परछाई
जो मुझे रातों में दिखाई नहीं देती
फिर मैं सुबह के इंतजार में सो जाता हूँ
सुबह होती है मैं खोलता हूँ अपनी आँखें
और झाकता हूँ अपने दिमाग में
जहाँ पाता हूँ मैं कुछ नहीं
न स्वप्न न स्वप्न की परछाई
फिर मैं झाकता हूँ अपने दिल में
पर स्वप्न वहाँ भी नहीं
हाँ लेकिन यहाँ मैं पाता हूँ एक चाह
अपने खोये स्वप्न को खोजने की
जिस से मिलना बन जाता है मेरे लिए
एक नया स्वप्न
जिसे मैं बुनता हूँ .
आकर अँधेरी रातो में
मेरे अन्दर कुछ स्वप्न
जो मुझे डरा देते हैं
गहरी नींद से जगा देते हैं
और उठ के जैसे ही मैं बैठता हूँ
न जाने कहाँ गायब हो जाते हैं वे स्वप्न
छोड़ कर मेरे दिमाग में अपनी परछाई
जो मुझे रातों में दिखाई नहीं देती
फिर मैं सुबह के इंतजार में सो जाता हूँ
सुबह होती है मैं खोलता हूँ अपनी आँखें
और झाकता हूँ अपने दिमाग में
जहाँ पाता हूँ मैं कुछ नहीं
न स्वप्न न स्वप्न की परछाई
फिर मैं झाकता हूँ अपने दिल में
पर स्वप्न वहाँ भी नहीं
हाँ लेकिन यहाँ मैं पाता हूँ एक चाह
अपने खोये स्वप्न को खोजने की
जिस से मिलना बन जाता है मेरे लिए
एक नया स्वप्न
जिसे मैं बुनता हूँ .
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