हर ऊँचाई के बाद एक ऊँचाई है
जिन्दगी कहाँ कभी आसमान छू पाई है
वो जो समझता है खुद को बहुत ऊंचा
वास्तव में ऊंची तो केवल उसकी परछाई है
पर परछाइयां तो हमेशा दूसरो के प्रकाश से बन पाई हैं
अर्थात उनका हर एक आज उनके मार्ग में खोद रहा खाई है
जो ये नही मानते
कि हर ऊँचाई के बाद एक ऊँचाई है
वो लोग जो तुम्हारी करते बडाई हैं
उनकी बदाइयों में कहाँ सच्चाई है
हाँ हो भी सकता है वे मन से कहते हों
पर तुम तो जानते हो न
हर ऊँचाई के बाद एक ऊँचाई है
जिन्दगी कहाँ कभी आसमान छू पाई है
ये जिन्दगी हर पल अधूरी है
कहाँ किसी के सपनो की पूर्ति हो पाई है
खुद को ऊंचा समझ रुकना
यहाँ एक भूल होगी क्योंकि
यहाँ हर ऊँचाई के बाद एक ऊँचाई है
जिन्दगी कहाँ कभी आसमान छू पाई है।
जिन्दगी कहाँ कभी आसमान छू पाई है
वो जो समझता है खुद को बहुत ऊंचा
वास्तव में ऊंची तो केवल उसकी परछाई है
पर परछाइयां तो हमेशा दूसरो के प्रकाश से बन पाई हैं
अर्थात उनका हर एक आज उनके मार्ग में खोद रहा खाई है
जो ये नही मानते
कि हर ऊँचाई के बाद एक ऊँचाई है
वो लोग जो तुम्हारी करते बडाई हैं
उनकी बदाइयों में कहाँ सच्चाई है
हाँ हो भी सकता है वे मन से कहते हों
पर तुम तो जानते हो न
हर ऊँचाई के बाद एक ऊँचाई है
जिन्दगी कहाँ कभी आसमान छू पाई है
ये जिन्दगी हर पल अधूरी है
कहाँ किसी के सपनो की पूर्ति हो पाई है
खुद को ऊंचा समझ रुकना
यहाँ एक भूल होगी क्योंकि
यहाँ हर ऊँचाई के बाद एक ऊँचाई है
जिन्दगी कहाँ कभी आसमान छू पाई है।
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