Thursday, April 24, 2008

ऊँचाई

हर ऊँचाई के बाद एक ऊँचाई है
जिन्दगी कहाँ कभी आसमान छू पाई है
वो जो समझता है खुद को बहुत ऊंचा
वास्तव में ऊंची तो केवल उसकी परछाई है
पर परछाइयां तो हमेशा दूसरो के प्रकाश से बन पाई हैं
अर्थात उनका हर एक आज उनके मार्ग में खोद रहा खाई है
जो ये नही मानते
कि हर ऊँचाई के बाद एक ऊँचाई है
वो लोग जो तुम्हारी करते बडाई हैं
उनकी बदाइयों में कहाँ सच्चाई है
हाँ हो भी सकता है वे मन से कहते हों
पर तुम तो जानते हो न
हर ऊँचाई के बाद एक ऊँचाई है
जिन्दगी कहाँ कभी आसमान छू पाई है
ये जिन्दगी हर पल अधूरी है
कहाँ किसी के सपनो की पूर्ति हो पाई है
खुद को ऊंचा समझ रुकना
यहाँ एक भूल होगी क्योंकि
यहाँ हर ऊँचाई के बाद एक ऊँचाई है
जिन्दगी कहाँ कभी आसमान छू पाई है।

No comments: