खिड़की वाली सीट
(१)
बड़ी मुश्किल से मौका मिलता है
हाँ मगर जब कभी भी
होता हूँ ट्रेन की खिड़की वाली सीट पर
तो खिड़कियों से झाककर
मैं बातें करता हूँ खेतो से
खेतो में लगे सरसों के फूल से
और पूछता हूँ
कैसा था मेरा बचपन
तुम्हे तो याद होगा!
और वे अब जैसे ही बताने को होते हैं
मैं आगे बढ़ जाता हूँ
वे पीछे छूट जाते हैं साथ लिए मेरा बचपन ।
(२)
ट्रेन की खिड़की वाली सीट पे बैठे
जब कभी मैं देखता हूँ खाली मैदान
बिल्कुल समतल
मुझे दिखाई देने लगता है मेरा बचपन खेलते हुए
एक झुंड में
और याद आने लगता है मुझे
जीतने और हारने की स्तिथियों में अन्तर।
(3)
ट्रेन की खिड़की वाली सीट पर बैठे
जब कभी निगाहें पड़ती है
किसी कच्ची पतली
दो खेतो के बीच के सड़क पे
तो मुझे न जाने क्यों लगता है
वो पगडण्डी सीधे मेरे घर को जायेगी
और फ़िर उस पगडण्डी पर
जब दिखता है कोई लड़का मुझे
साईकिल चलाता हुआ
तो मुझे याद आता है
मेरा बचपन साईकिल पे
लड़खराता हुआ।
(४)
ट्रेन की खिड़की से
बाहर देखना
मेरे लिए जैसे
अपने बीते दिनों के अन्दर झांकना है।
(५)
जब कभी कही
बिना किसी स्टेशन, जंक्शन
के ही रुक जाती है ट्रेन
और सौभाग्य से
खिड़की के बाहर के नज़ारों में हो
कुछ फूस के मकान
फ़िर मकान के सामने सड़क पे
खेलते कुछ बच्चे
तो लगता है काश ये ट्रेन
येही रुकी रह जाती
पर ये काश
काश ही रह जाती है।
(६)
जब कभी मुझे दिखाई देते है
ट्रेन की खिड़की से बाहर
पानी पटाये जाते कुछ खेत
तो मेरी सारी प्यास मिट जाती है
और पट आते हैं मेरे आँख।
(७)
काश की
मेरे शहर के डेरे वाले मकान में भी
ट्रेन की खिड़की होती
तो मैं हमेशा पाता
अपने कल को अपने आज के साथ।
No comments:
Post a Comment