Monday, April 2, 2012

मोहलत कहाँ है

फिर मुझे प्यार करने की मोहलत कहाँ है
तुझे याद करने की मोहलत कहाँ है
वो जमाना कुछ और था जो गुजर गया
पुराने पन्नों  को पढने की मोहलत कहाँ है

फिर मुझे प्यार करने की ...

इन छोटे से कंधो पे अब भार बहुत है
तेरे संग झूले झूलने की मोहलत कहाँ है  

सुबह से शाम तक वक़्त मुझे घुमाता है इस कदर
रात में संग छत पे टहलने की मोहलत कहाँ है

फिर मुझे प्यार करने की ...

इतनी भीड़ है की खुद को खोजना मुश्किल है
मीलों तक तेरा पीछा करने की मोहलत कहाँ है
यहाँ हर सांस में फायदे की बू आती है
तुझे जीने की सोचु फिर से मोहलत कहाँ है

फिर मुझे प्यार करने की ...

माँ की बूढी आँखों में सपने सूखते जा रहे हैं
तुझे ख्वाबों के महल बना के दू मोहलत कहाँ है
फिर मुझे प्यार करने की मोहलत कहाँ है
तुझे याद करने की मोहलत कहाँ है..."

----शशिष कुमार तिवारी

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