Monday, April 2, 2012

कुछ खोया खोया रहता हूँ

कुछ खोया खोया रहता हूँ
जब भी मैं तुमसे मिलता हूँ
नैनों में कुछ कुछ होता है
जब भी मैं तुझमे घुलता हूँ

रातों में तब मैं जगता हूँ
जब ख्वाबों में तुम आते हो
तुम हो न जाओ जुदा मुझसे
ये सोच के भी मैं डरता हूँ

कभी चलते चलते जब रुकता हूँ
तो पन्नों पे तुझको ही लिखता हूँ
जब अँधेरा सा दिल में छाता है
तब तुझको ही मैं पढता हूँ

बातों में जो न कह पाया मैं
ख़ामोशी में तो कहता हूँ
तू समझे या फिर न समझे
मैं दिल से तुझपे मरता हूँ

                         कुछ खोया खोया रहता हूँ ......   

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