Sunday, June 2, 2013

दिलों के जख्म भी यारों सवरतें हैं कभी कभी
हम यूहीं बेवजह मरते हैं कभी कभी

कोई अनजान सा चेहरा दिल को इतना भा जाता है
कि हम तलाशते हैं उसको अपनों में कभी कभी

कोई जब रूठ जाता है दिल टूट जाता है
इश्क के महफ़िल में ऐसे पल आते हैं कभी कभी

दूर होके भी कोई दिल के पास होता है
लहरे चूम लेती हैं तपती धूलों को कभी कभी

ये इश्क चीज ऐसी है दिल खो ही जाता है
फिर खोजने में ज़माने लगते हैं कभी कभी ....

दिलों के जख्म भी यारों सवरतें हैं कभी कभी।

-शशिष कुमार तिवारी
(1.25pm, 1st June at Hazaribag)

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