अँधेरा है आ इक रौशनी जलाते हैं
सवेरा है आ अब गले लग जाते हैं
कब तक लड़ेंगे यूँ अकेले भला
आ मिल के अब तो एक हो जाते हैं
तू सागर और मैं साहिल ये कब तक चलेगा
आ या तो पूरा साहिल या पूरा सागर बन जाते हैं
जुदा होके फूल से कब तक रहेगी खुशबू भला
आ भटके परिंदों को उनका घर दिखाते हैं
अँधेरा है आ इक रौशनी जलाते हैं
सवेरा है आ अब गले लग जाते हैं।
-शशिष कुमार तिवारी
(11.37am, 4th June at Hazaribag)
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