Monday, June 3, 2013

अँधेरा है आ इक रौशनी जलाते हैं 
सवेरा है आ अब गले लग जाते हैं 

कब तक लड़ेंगे यूँ अकेले भला 
आ मिल के अब तो एक हो जाते हैं 

तू सागर और मैं साहिल ये कब तक चलेगा 
आ या तो पूरा साहिल या पूरा सागर बन जाते हैं 

जुदा होके फूल से कब तक रहेगी खुशबू भला
आ भटके परिंदों को उनका घर दिखाते हैं

अँधेरा है आ इक रौशनी जलाते हैं  
सवेरा है आ अब गले लग जाते हैं। 

-शशिष कुमार तिवारी 
(11.37am, 4th June at Hazaribag)

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