Thursday, December 1, 2016

"अब और क्या लिखूं मैं
तुम्हें लिखा था जब तक मैंने
लिखा था खुद को भी उसी में मैंने

अब तुम्हें लिखने की
कोई जरुरत महसूस नहीं होती
कुछ महसूस ही नहीं होता तुम्हारे बिना
कि तुम वो एहसास थे जिसे लिखना था
जिसे जीना था 
कि तुम हो ख्वाब थे जिसे पाना था
तुमने जितना समझा खुद को मेरे लिए
उससे कहीं अधिक थे तुम
उससे कहीं ज्यादा

कि तुम थे
तो थे शब्द मेरे पास
अब तुम नहीं हो
तो बस खामोशियाँ हैं
ये मेरे आस पास
मेरे बहार भीतर
हर जगह पसरी हुईं हैं
तुम्हारे नाम की खामोशियाँ

अब और क्या लिखूं मैं!!!"

-शशिष

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