Wednesday, November 16, 2016

"लोग आपको सुनते जरूर हैं लेकिन बड़े कम ही लोग आपको समझने के लिए सुनते हैं! सुनना अलग बात है और किसी को समझने के लिए सुनना दूसरी बात है। ज्यादातर समस्याएं इसलिए आती हैं कि हमलोग जवाब देने लिए सुनते हैं, ना कि किसी को समझने के लिए! अगर कोई किसी को समझने के लिए सुने तो जीवन की बहुत सारी समस्याएं अपने आप समाप्त हो सकती हैं। लेकिन कई बार हम लोगों के बारे में पहले ही एक धारणा बना लेते हैं और फिर हम वही सुनते हैं जो सुनना चाहते हैं! इस प्रकार हम खुद के साथ साथ दूसरों को भी दुःख पहुँचाते हैं और जो रिश्ते बचाये जा सकते थे हम उन्हें आसानी से खो देते हैं! यहाँ कोई किसी की व्याख्या सुनने के लिए तैयार नहीं और सुन भी ले तो समझने के लिए तैयार नहीं! ऐसा लगता है कि किसी को व्याख्या देना अपने समय की बर्बादी है, कम से कम ऐसे लोगों को व्याख्या देना जो समझने के लिए तैयार ही ना हो तो बिलकुल बेकार है! भला कितने लोगों को आप व्याख्या देंगे....कितने लोगों को समझायेंगे! ये देखिये कि अगर सामने वाला आपको ना समझने की कसम खा चुका है तो फिर अपना काम कीजिये क्योंकि आप जबरदस्ती किसी से अपनी बात नहीं मनवा सकते और जबरदस्ती की जरुरत भी क्या है! जबरदस्ती रिश्ते नहीं निभाए जाते; रिश्ते तो दिल से निभाए जाते हैं! रिश्तों में शब्द तो शब्द है खामोशियों को भी समझना होता है; रिश्तों की उम्र उतनी ही लंबी होती जितनी हमारी समझदारी की! कोशिश कीजिये कि एक दूसरे को समझने के लिए सुना जाए; कभी किसी को समझने के लिए सुन कर देखिये शायद नज़ारे बदल जाएं; शायद उम्मीद का वो दीया जो बुझने को है फिर से जलने लगे; शायद दिल के किसी कोने में जहाँ कल तक एक सुकून रहा करता था फिर से वापस आ जाये! जी! समझना एक बहुत बड़ी कला है और आप इसे बखूबी जानते हैं बस एक बार कर के देखिये!"

"मुझे पता है
तुम नहीं समझोगे मुझे
और शायद तुम्हारे बाद भी
मैं बहुत कम समझा जाऊं
पर मेरी मज़बूरी है
कि मैं रुक नहीं सकता
मुझे चलना होगा
चलते रहना होगा
ताकि
जिंदगी के किसी मोड़ पे
जब तुम मिलो मुझे
तो मेरी ख़ामोशी
तुम्हें वो सब कुछ समझा दे
जो आज मेरे शब्द नहीं कर पाएं हैं!"

-शशिष

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