बस दो पंक्तियाँ---
"इतना अकेला हूँ कि कभी कभी खुद भी नहीं दिखता खुद को
न जाने किसकी तालाश है जो मिल के भी नहीं मिलता मुझको।"
-शशिष कुमार तिवारी
(6.29pm, 3rd July, 2013 at Hazaribag)
"इतना अकेला हूँ कि कभी कभी खुद भी नहीं दिखता खुद को
न जाने किसकी तालाश है जो मिल के भी नहीं मिलता मुझको।"
-शशिष कुमार तिवारी
(6.29pm, 3rd July, 2013 at Hazaribag)
No comments:
Post a Comment