Thursday, April 4, 2013

"प्रिय! तुम कविता ही हो"

तुम्हें चाहा
भूल जाना
और
कोशिश भी की
और पता है?
तुम्हें भूल भी गया
वो बात अलग है
कि
अब भी मैं
लिखता जा रहा हूँ
तुम्हें ही
और तुम्हारे भूलने को ही
हर रोज
और
लोग क्या कहते हैं
तुम्हें पता है?
लोग कहते हैं
कि
मैं क्या खूब कवितायेँ लिखता हूँ
लेकिन
मैंने तो केवल तुम्हें लिखा है
पर शायद
लोग सही ही कहते हैं
तुम कविता ही तो हो
जिसे जितना समझा जाए
उतना ही
कुछ और समझ लेना
बाकि बाकि सा लगता है
मेरे प्रिय!
तुम कविता ही हो!!!

-शशिष कुमार तिवारी

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