Saturday, March 30, 2013

"एक अजनबी सा प्रेम"

मैं अब भी वहा जाता हूँ 
जहा तुम्हें 
पहली बार देखा था 
मुस्कुराते हुए 
खिलखिलाते हुए 
अपने रेशमी बालों को 
अपने चेहरे से 
हटाते हुए ...

न जाने तुम 
किसके इंतज़ार में खड़े थे 
मेरी गली के चौराहे पर 
जिसने उस दिन से पहले 
मुझे कुछ खास नहीं दिया था...

मैं चाहता था 
कि 
वो पल ठहर सा जाए
और तुम्हें पता है?
वो ठहरा हुआ है 
बिलकुल वही का वही 
बिलकुल जस का तस 
और 
मैं आज भी हर रोज 
तुम्हें देखता हूँ 
वैसे ही मुस्कुराते हुए 
अपने यादों की दुनिया में 
और सोचता हूँ 
-किसी को बिना पाए 
कभी न खोने की जिद!
क्या हो गया गया है मुझे?
क्या यही अजनबी सा प्रेम है 
जो ठहर गया है 
तुम्हारी ठहर और मेरी नज़र के बीच!

ओह! ये जो कुछ भी है 
खुदा इसे युही ठहराय रहना 
जब तक की ठहरी हुई हैं 
मेरी साँसे मेरे अन्दर।

-शशिष कुमार तिवारी 
पटना .

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