Thursday, August 25, 2011

अनभिज्ञ

हाँ
मैं तुम्हें मना नहीं सकता 
बता नहीं सकता
कि क्यूँ हूँ मैं खामोश 
तुम्हें खामोश देख कर भी 

तुम्हें लगता होगा कि
मुझे कोई परवाह नहीं
तुम्हारी नाराजगी से 
लेकिन ऐसा नहीं
पर न जाने फिर भी क्यूँ
इस बार मैं ये नहीं मानता कि
मैं तुम्हें मना पाउँगा 
क्यूंकि शायद मैं अब वो नहीं
जो था तुम्हारे साथ होने में...
अब कुछ अजीब सा है 
जो शब्दों में न तो बयान होता है
और न घुलता भावनाओ में.....

1 comment:

Anonymous said...

ye kiske liye?