Saturday, May 3, 2008

वो चोरी से आंसूओं में छुप गई

वो समझ न सकी मेरी मोहब्बत कभी
मैं बिखरा टूट के जहाँ देखते रह गई

मैं! न जाने क्या बन गया पहले क्या था
हर सख्स हंस के गया मुझपे अपनी हंसी

मैं भूला खुद को अपनी हर मुस्कान को
बस वो हंस दे पलट के आँखे सोचते रह गई

दोस्तों ने कहा , अपनों ने कहा , बिखरते हर सपनो ने कहा
हटा दूं उसे अपने अन्दर से मैं
जब कोशिश की वो चोरी से आंसूओं में छुप गई

जब भी पूछा उस से मैंने अपनी कमी
 वो
पलके झुकाए 'कुछ नहीं' कह गई

वो समझ न सकी मेरी मोहब्बत कभी
मैं बिखरा टूट के जहाँ देखते रह गई ।

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