Saturday, January 24, 2015

"इक आग
सबके अंदर है
डर से ढ़की हुई

इक दरिया
सबके अंदर है
बेवजह रुकी हुई

कोई अपने भीतर जाये
तो जागे फिर
सब सोये हैं
बस आँखें हैं खुली हुई

वक्त सबका है जा रहा
सब देखे हैं
पर मानता
जानता कोई नहीं

हैरत है
इंतज़ार लम्बा होता जा रहा
जिंदगी छोटी होते जा रही

ना जाने कब
भोर होगी
कब जागेंगे लोग
भीतर से यहाँ???"

-शशिष कुमार तिवारी
 

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