Friday, January 23, 2015

"बहुत चाहा था तुम्हें
बहुत कोशिश की थी

बहुत करीब आया था तेरे
बहुत साजिश की थी

हां तुम्हें बताया नहीं था कभी
पर बहुत मोहब्बत की थी

किया था कई बार मैंने
तेरा पीछा भी

कई बार राह पे
घंटों किया था
तेरे गुजरने का इंतज़ार भी

कभी मैं भी
पागल सा था
कभी मैं भी
मोहब्बत सा था

दीवाना था
तुझे देखते रहने का
तेरी तस्वीरों को संजो के रखने का

बिन देखे तुम्हें
मेरी बेचैनियां
थमने का नाम ही नहीं लेती थी

बिन देखे तुम्हें
सूरज चाँद सब अधूरे से लगते थे

मोहब्बत ही थी न
और कौन कर सकता है
इतना पागल मुझको

पर देखो न
अब मैं ना जाने कैसे
जिन्दा हूँ
तुम्हारे बगैर भी

अब मेरी बेचैनियां
ना जाने क्यों इतनी समझदार हो गयीं हैं

अब मेरी साँसें ना जाने क्यों नहीं अटकती
अब मेरी धड़कनों को
ना जाने क्यों नहीं सुनाई देते तुम्हारे पदचाप

पता नहीं
जो कल था वो झूठ था
या जो आज है वो झूठ है

या सब कुछ सही है
बस जिंदगी ने कुछ समझदार होने की
गलती कर दी है

जो भी है
अच्छा है अब

जो भी था
अच्छा था तब

बस यूहीं
यादों के घर में
मेहमान की तरह
आते रहना

और मैं ना मिलूं
तो समझ लेना
तुम्हें खोजने निकला हूँ

या फिर हो गया हूँ
अधिक समझदार
जैसा कि तुम चाहते थे
मुझे हो जाना हर बार

और सुनो
अगर लगे कि
मैं पागल ही अच्छा था
बेवकूफ ही अच्छा था

तो लिख जाना एक खत
और उसमे अपना दिल

छोड़ जाना
मैं जब भी लौटूंगा
पढ़ लूंगा
और
लौटा दूंगा तुम्हें
तुम्हारा शशिष!!!"

-शशिष कुमार तिवारी 

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