"और फिर येही से ..."
जैसे किसी छोटे पौधे की जड़
और मेरा ह्रदय
जैसे नवीन नाजुक माटी
वक्त जैसे जैसे बीतता गया
जड़ें समाती गईं
माटी के अन्दर
फिर धीरे धीरे माटी ने
जड़ों को फैलने दिया
अपने रोम रोम में
और फिर
तुम बढ़ने लगे
खिलने लगे तुममें
सुन्दर सुन्दर पुष्प
और तुम्हारी खुशबू
फैलने लगी चारो तरफ
तुम सवरते चले गए
दिन प्रतिदिन
होते गए और भी आकर्षक
और फिर
एक दिन
जब सब लोग
तुमसे करने लगे प्यार
तुम इतराने लगे अपने पुष्पों पर
और भूल गए
अपना जड़ और मेरा ह्रदय
और येही से
शुरू हुआ फिर
एक और सुन्दर प्रेम का
अंत ... दुखांत!
-शशिष कुमार तिवारी
(2.49pm, 13th July 2013 at Patna)
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