Tuesday, May 24, 2011

"अन्तःस्वर "

न हकीकत ही सही है 
न सही कोई सपना है 
अब कैसे कहे कि कौन अपना है  

अजब सी जिन्दगी है 
अजब सा द्वंद है 
हुए अपने पराये 
ये पैसा भी क्या चीज है 

ये युग कौन सा है 
कि केवल स्वार्थ ही सबके दिल में बसा है 
कि आदमी के कितने रंग हैं आज 
भला ये किससे छुपा है

बदलना वक्त को खुद से पहले 
बड़ा मुश्किल है अब 
जीना ये जिन्दगी दूसरों की दिशा में 
बड़ा मुश्किल है अब 

वही करना है जो 
दिल चाहता है 
ये उपर वाला भी 
कहाँ दुबारा जिन्दगी बांटता है!!!


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