Saturday, May 3, 2008

मेरी जाँ निकलती है

महक फूलों की अब नहीं बागों में मिलती है
याद आए जो उनकी ये मेरी जाँ निकलती है

बड़ी बेरहम है ये दुनिया जरा बच के रहना
देख तेरी खुशी "शशिष" पूरी कायनात जलती है

बड़ी धूप है बाहर तू छाता लेकर निकलना
ये नये युग की गर्मी है शाम होने पे और बढती है

खामोश ही रहना किसी से कुछ पूछना मत
हर सवाल पे यहाँ जान की धमकी निकलती है

क्या हुआ गर "शशिष" टूट गए हों कुछ रिश्ते तेरे
भला महज खुशी से कहाँ जिन्दगी सवरती है

महक फूलों की अब नहीं बागो में मिलती है  
याद आये जो उनकी ये मेरी जाँ निकलती है...

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